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ईश्वर की प्रेरणा किसको कब मिल जाय, ये कहा नहीं जा सकता । ऐसी ही कुछ विशिष्ट प्रेरणा इस पुस्तक के रचयिता को भी मिली है। बचपन से ही सुख दुख के उतार चढाव से जूझते हुए कब साठ साल बीत गए पता ही नहीं चला । यूँ तो भगवान राम में अनुराग इस पुस्तक के रचयिता को शुरू से ही था, लेकिन जिंदगी के अंतिम पडाव में जीवन में कुछ ऐसे घटनाक्रम घटित हुए कि लाखों लोगों की तरह  रचयिता के भी आराध्य देव  भगवान राम बन गये ।

राम राम रामहि जग सारा । रामनाम मुझको लगे प्यारा ।।

इसी रामनाम के प्यार ने रचयिता को इस पुस्तक में वर्णित काव्य को प्रस्तुत करने की प्रेरणा दी है जो कि रचयिता की प्रथम काव्यरचना है । भक्ति से सराबोर मानवजनम के उद्देश्य को वर्णित करते हुए रचयिता ने अपने पाठकगणों को भक्तिरस में डूब जाने के लिए विविध तरह के काव्य की रचना की है जिसका आनन्द सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी ले सकता है क्योंकि इसकी प्रस्तुति बोलचाल की हिन्दी में ही है । इस पुस्तक की रचना इसलिए और समसामयिक हो जाती है कि वर्षों के प्रयास के बाद भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या में   भगवान राम को पुनः प्रतिष्ठित किया जा रहा है । उम्मीद है कि पाठकगण भी इसका उतना ही रसास्वादन कर सकेंगें जितना रचयिता ने खुद किया है ।