टेक – पायो रे मै तो रामरतन रघुराई ।

     सुनो रे गाथा कलयुग का मेरे भाई ।।

यह कलिकाल गठरि पापन की, जीव अधम गति पाई ।

रामनाम आधार बना ले, पाप सभी धुल जाई ।। 1 ।।

              पायो रे मै तो रामरतन रघुराई…

नानाविधि बहु करम करत है, स्वारथ धरम धराई ।

धावहि हरपल उठतहि पङि पङि, सुध फिर भी ना आई ।। 2 ।।

              पायो रे मै तो रामरतन रघुराई…

जीवन को व्यापार बना दी, लोभ को मन में बसाई ।

लेनदेन बहुभॉति करत है, मोह कभी ना भुलाई ।। 3 ।।

              पायो रे मै तो रामरतन रघुराई…

छीनाझपटी लूटपाट को, निसदिन करम बनाई ।

ज्ञानविज्ञान नहीं कुछ भावे, जीवन नरक कराई ।। 4 ।।

               पायो रे मै तो रामरतन रघुराई…

बङछोटन का भेद भुला के, लाजशरम को गवाई ।

मानसम्मान की रिति गवाँ दी, तनिक नही सॅकुचाई  ।। 5 ।।

               पायो रे मै तो रामरतन रघुराई…

मारपीट आतंक तबाही, हरदम करत लङाई ।

ये पागलपन खतम करो ना, प्रेम कहाँ बिसराई  ।। 6 ।।

               पायो रे मै तो रामरतन रघुराई…

झूठ पाखंड ढोंग कुनीति, इन सबकी अधिकाई ।

अत्याचार करे जीवों पर, राक्षस होई फिराई ।। 7 ।।

               पायो रे मै तो रामरतन रघुराई…

रोगब्याध छूटे नहि तन से, मन ब्याकुल होई जाई ।

योग नेम ब्रत दान धरम सब, पास नहीं कुछ भाई ।। 8 ।।

               पायो रे मै तो रामरतन रघुराई…

ईश्वर रचि रचि प्रकृति बनाई, मानव इसे लुटाई ।

यह संसार सभी प्राणी का, ज्ञान कभी ना पाई ।। 9 ।।

               पायो रे मै तो रामरतन रघुराई…

अंतहीन मानव के अवगुण, जीवन ब्यर्थ बिताई ।

इस जीवन में दर दर भटका, देर से समझ में आई ।। 10 ।।

               पायो रे मै तो रामरतन रघुराई…

जीवन प्रतिपल घटता जाता, कुछ नहीं करी कमाई ।

देख अधोगति मनवा रोए, सुखशाँति सब जाई ।। 11 ।।

               पायो रे मै तो रामरतन रघुराई…

राम रहत सर्वत्र जगत में, मम उर में भी समाई ।

कहत सुरेश एक ही साधन, राम भजन सुखदाई ।। 12 ।।

             पायो रे मै तो रामरतन रघुराई…

                      —–इति—–


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